भाग -१

उत्तरी भारत में शैव परम्परा का एक योगी थें जिनका नाम मीणनाथ या मत्छेन्द्रनाथ था । मत्छेन्द्रनाथ ‘नाथ’ _ सम्प्रदाय (पंत ) के योगी थें। लेकिन एक बार एक किशोर को दीक्षा देने के बाद उनके जीवन में एक चौंकाने वाला बदलाव आया! वह युवक ‘गोरख’ भगवान शिव का अवतार थें । गुरु मीणनाथ बिना कुछ सोचे समझे उन्हें दीक्षा दिया और उस युवक को योग की कुछ गुप्त विधियाँ सिखाईं। फिर उन्होंने उसे एकांत स्थान पर भक्तिपूर्वक अभ्यास करने का निर्देश देकर कहीं चले गए ।

वह युवक – ही बाद में शिवगुरु गोरखनाथ बन गए! हालाँकि, उस किशोर ने बारह वर्ष की कड़ी मेहनत से सिद्धियां प्राप्त किया, आत्म-ज्ञान लाभ किया! उन्हे जगत (ठोस), जीवन और ईश्वर रहस्यों के बारे में ज्ञान प्राप्त हुई। समाधि भूमि से उतरकर जब उनके शरीर में होश लौटा तब सबसे पहले उनके मन में अपने गुरुदेव मीणनाथ या मत्छेन्द्रनाथ की बात याद आई।

इस बीच यह हुआ था – मीणनाथ इधर से उधर भ्रमण किया करते और मनुष्यों को योग मार्ग की दीक्षा दिया करते । भाग्य का निष्ठुर विडम्बना या पूर्व पूर्व जीवन का कोई प्रारब्ध के कारण मीणनाथ एक युवती पर सम्मोहित होकर उसके साथ विवाह किये । कुछ जर-जमीन प्राप्त करके कुछ ही दिनों के में खेती-बाड़ी करने लगें और अपने अवस्था को सुधार लिये । संसार जीवन के दौरान उनके दो बच्चे भी हुई , अर्थात एक बात में कहा जाए तो वह परम सांसारिक की तरह अपने जीवन बीतने लगें । उन्होंने अपना पहले का त्याग , संयम साधना जीवन की बातें , गुरु परंपरा की शिक्षा एकदम से भूल गए।

इसी बीच गोरखनाथ की समाधि टूटने के बाद गुरुदेव मीणनाथ को स्मरण करते ही गुरुदेव का सबकुछ (तीसरी ) आंख के सामने आ गया। बिना देर किये गोरखनाथ तेजी से उस स्थान की ओर रवाना हो गए, जहां अभी मीणनाथ रह रहे थें! पहाड़ीयों की चोटी पर चलते हुए गोरखनाथ हाथ में डफली (वाद्य यंत्र) लिए बजा रहे थें और डफली से आवाज उठने लगी ” जागो मत्छेन्द्रनाथ गोरख आया ” !

गोरखनाथ का योग सिद्धि स्थिति था फलस्वरूप उनके चलने- फिरने की कला अलग थी , वायु कि गति से वहां पहुंच गए … मीणनाथ के आवास के पास ।

मीणनाथ घर पर किसी काम में व्यस्त थें। अचानक उन्हें गोरखनाथ के डफली की आवाज सुनाई दी “जागो मत्छेन्द्रनाथ गोरख आया”! मीणनाथ का दिल कांप उठा – वह जल्दी से सब कुछ संभालने लगें और उन्हें एहसास हुआ कि अब संसार ( गृह जीवन ) में रहना संभव नहीं होगा! सोचते सोचते क्षण भर में ही गोरखनाथ वहां आकर हाजिर हो गये ! आतेही गोरखनाथ ने गुरुदेव को प्रणाम किया और उनकी कुशलता के बारे में पूछा।

गुरुदेव ने अपने विषय मामलों तथा पत्नी और बच्चों के बारे में बताना शुरू किए । उन्होंने यह भी कहा कि वह अब इनसे जुड़ गये हैं ! गोरखनाथ ने सारी बातें ध्यान से सुना, और कहा- “ठीक है! मैंने सब कुछ सुन लिया है_ अब चलिए अपनी असली जगह पर !” मीणनाथ चिल्लाकर कहें – “चलूंगा मतलब! यह देखो मेरा सुनहरा चाँद सा छोटा लड़का !” गोरखनाथ ने उत्सुकता से कहा- “देखें, देखें ! देखें जरा आपके बच्चे को देखता हूं !”- यह कह कर अपना हाथ आगे बढ़कर बालक को लेकर पथरीले मिट्टी पर पटक डाला और क्षण भर में ही वह बालक तड़पकर कर दम तोड़ दिया! मीणनाथ की स्त्री यह देखकर बड़े ही भयानक तरह से चीख -चीख कर रोने लगी _” हाय , हाय ! मेरी क्या अनहोनी हो गई “, यह बोलकर उसने अपने पुत्र को गोद में उठाकर बड़े ही बेचैनी से रोने लगी! मीणनाथ भी अपने लहू -लहान, मरे हुए बच्चे को देखकर गोरखनाथ से कहा , ” यह तुमने क्या किया! तुम मुझे ले जाना चाहते हो , चलो- परंतु एक बालक को इस प्रकार निर्दयता से पटक कर मार डालना क्या सही हुआ ?” जैसे कुछ भी नहीं हुआ इस तरह का भाव से गोरखनाथ बोला – ” ए क्या गुरुदेव यह बच्चा मर गया क्या ? तो क्या हुआ ? आपकी कृपा यदि मेरे ऊपर हो तो आपकी कृपा से यह बच्चा फिर से स्वस्थ हो जाएगा ।” – यह कहकर उसने जैसे ही अपने चिमटा को मिट्टी पर तीन बार पटका , वैसे ही वह बालक स्वस्थ होकर झट से उठकर खेलना शुरू कर दिया! ….. क्रमश।

(कहानी स्वामी परमानंद जी। संकलक श्रीधर बनर्जी ‘ कथा प्रसंग ‘ । Translated by Sudhir Sharma, a former student of Bangaram Paramananda Mission.)