हम कैदी मुक्ति कहानी का उस छोर पर थें , जहाँ लंबे समय बाद जेल से कैदी को मुक्त करने के बाद भी वह अपना घर नहीं जाकर जेलर साहब से मिलना चाह रहा था । इसके लिए उसने हर कष्ट को झेल रहा था । और किसी चीज के प्रति सम्मोहित ना होकर उसने अपना निर्णय पर अटल रहा । और अंत में जेलर साहब से उसे दर्शन हो ही गया । अब आगे —
स्वयं जिला साहब को अपनी आंखों को सामने देखकर कैदी का मुंह से किसी भी प्रकार का शब्द नहीं निकल रहा था। क्या करें या ना करें उसे समझ में नहीं आ रहा _ किंकर्तव्यविमूढ़ का अवस्था! तब स्वयं जेलर साहब उसका हाथ पकड़ कर अंदर ले जाकर बैठाया । दो चार मधुर बातें कर उसका अंतर का हल-चल को शांत किया कैदी का मनो कामना पूर्ण हुआ । ( सायूज्य)
कोई कोई यहां से ही लौट जाता है । परंतु हमारे कहानी का कैदी आम कैदी जैसा नहीं है ! उसने जब जेलर साहब को इतने करीब से पाया है _ और उन्हें छोड़ना नहीं चाहता ! उसने बोला_ “हे प्रभु ! आपका दर्शन पाया हूँ , संस्पर्श पाया हूँ _ परंतु इससे मेरा मन भरा नहीं । मैं सदा सदा के लिए आपके साथ रहना चाहता हूं , आपका सेवक होकर – नौकर बनकर रहना चाहता हूं ! और यदि आप मुझे योग्य समझते हो तो आप मुझे अपना बंधु ,मित्र,शखा बना लें ! हे प्रिय आप तो मेरे अनंत प्रिये – परम प्रिये हो ! ! सदा सर्वदा आपको हीं देखूँगा, आपका बातें सुनूंगा, आपका मनन करूंगा, आप सामने नहीं भी होगी तो आपको स्मरण करूंगा !! जेलर साहब उसका आंतरिक व्यवहार विचार देखकर उसे सेवा करने का अधिकार दिया_ अपने गुणों से वह व्यक्ति धीरे-धीरे जेलर साहब का अत्यंत घनिष्ठ हो उठा ।
कहानी समाप्त कर गुरु महाराज वहां उपस्थित सभी को उद्देश्य कर के बोलें _ ” देखो, यह जगत संसार जैसे जेलखाना या कैदखाना है ! महामाया का मोहिनी माया द्वारा वद्ध है साधारण मनुष्य _ भुवनमोहिनी माया काटकर क्या अपने क्षमता से बढ़ सकता है ? कभी संभब नहीं है !
तो उपाय क्या है ?
उपाय है ! ठाकुर श्री रामकृष्ण देव कह गए हैं _ ” कलयुग में नारदीय भक्ति_ रो-रो कर सिर्फ प्रार्थना !” यह युग में भक्ति मार्ग पकङ कर चलने से आध्यात्मिक उन्नति अपेक्षाकृत आसान है । भक्ति मार्ग का साधक गण यदि उस कैदी के तरह मालिक के पास सदा सर्वदा मुक्ति के लिए प्रार्थना करें _ मालिक (ईश्वर ) संतुष्ट होकर संसार रूपी कारागार से उसे मुक्त कर दे सकते हैं । मुक्त करने केबाद प्रहरी को नजर रखने को कहा गया है, इसका भी तात्पर्य है । माया मुक्त होने पर भी भक्त कई प्रलोभन में फंस जा सकता है _ परंतु ‘माँ’ यह नहीं चाहती । इसलिए आध्यात्मिक राह का पथिकों ( राहगीर) को भिन्न-भिन्न तरह से सहायता आता है_ ताकि उसके साधना में विघ्न ना घटे!
इसके बाद दुसरे स्तर का व्याख्या में आता हूँ _
भक्त कभी मुक्ति नहीं चाहता, वह मुक्तिदाता को चाहता है ! वह चाहता है_ उसका प्रियवर का दर्शन – स्पर्श, उन्का सानिध्य !
इसलिए उसने पहले ही अपने प्रियवर का ठिकाना ढूंढा है _ किस प्रकार वहां पहुंचे गा वह रास्ता एवं उस राह को पकड़ कर चलते चलते एक दिन वह पहुंच जाता है अपने प्रियवर पके ठिकाना का आसपास! इसे ही शास्त्र में कहा गया है_ सालोक्य स्थिति । भक्त भगवत लोक में पहुंच गया है_ इस लिए सालोक्य !
इसके बाद ढूंढ निकाला गया प्रियेवर का घर _ कितना उसका रौनक है ! क्या नयनमनोहर शोभा ! स्वच्छ सरोवर का सौंदर्य_ फुलवारी का फूल फल इत्यादि का सौंदर्य अनेकों को आकर्षित करने पर भी असली भक्त इस तरफ एक बार दृष्टि गोचर करने पर भी आकर्षित नहीं होता_ वह आगे बढ़ते जाना चाहता है अंदरमहल के तरफ ! प्रियेवर के निकट जब पहूंचा _ भक्ति शास्त्र में इस अवस्था को ‘ सामीप्य ‘ कहा गया है ।
भक्त का गिर गिराहट भरी प्रार्थना सुनकर जब अपकड़ जब पकड़ में आते हैं तो_ उसके पास खुद से आगे बढकर उसका हाथ थामते हैं, और अपने पास ले जाकर बैठाते हैं, तथा कुछ कुशल वार्ता भी करते हैं, तब भक्त अति आनंदित होकर आनंद से मग्न हो जाता है ! यह एक अवर्णनीय अवस्था है !! भक्ति शास्त्र में इस अवस्था को ‘ सायूज्य ‘ कहा गया है ।
यहाँ आकर भी साधक सुरक्षित नहीं है _ हर पद पर फिसने का संभावना है ! प्रत्येक स्तर में ही कुछ प्राप्त करने लायक है_ सिद्धियां !! इसके अलावा और भी लुभावन युक्त जालें!! अनेकों भक्त साधक अपने अपने चेतना का स्तर अनुसार एक एक स्तर पर आकर अटक जाते हैं_ और आगे बढ़ना नहीं चाहता । फिर जब उसे होश आता है तब उसे फिर से यात्रा प्रारंभ करना पड़ता है ! परंतु कोई कोई भक्त एक अन्य चिन्तन ( अद्वितीय चित ) का अधिकारी हो तब उसे आगे बढ़ने में कोई रुकावट नहीं आता , वह आगे बढ़ते ही जाता । तब तक चलता हैजब तक ना उसे ईश्वर से साक्षात्कार हो। यद्यपि जो ‘सच्चा भक्त’ होता है वह निराकार ईश्वर का साकार रूप दर्शन करने पर या उन्हें स्पर्श करने का सौभाग्य प्राप्त करने पर भी संतुष्ट नहीं होता वह और भी कुछ पाना चाहता है, सेवक- बंधु- शखा होकर सदा उनके आसपास करीब में रहना चाहता है वें हीं भक्त श्रेष्ठ_ भक्त कुलशिरोमणि कहलाता है !! सदा सर्वदा वहां निराकार का अपरूप रुप दर्शन और स्पर्श करते करतेउस भक्त का अपना स्वरूप भी परिवर्तन हो जाता है । वह भी तब प्रभु का रुप प्राप्त होता है यही ‘सारूप्य ‘_ स्थिति है ! बाउल यह रूप वर्णन करने में कहें हैं _ ” साधना से सिद्धि होना रुप से करना टलमल टलमल रे ‌•••• ” । ( साधनाय सिद्ध हबि रुपे करबे टलमल टलमल रे —-) इस प्रकार भक्तों का तब त्रिशारीरिक रुप का पुनः निर्माण होता है । फल स्वरूप वह शरीर का सानिध्य साधारण मानव आने से_ मनुष्य सोचने लगता ‘ यही हीं शायद भगवान हैं ‘ ‘भगवान का अभीन्न तनु ‘
इसके बाद सिर्फ रह जाता है , भक्त का_ भगवान के शरीर में लीन होना । भक्त का भगवान तत्व लाभ होना! यही वक्त-भगवान का मिलन होता है। योगीगण कहते हैं ‘जीवात्मा परमात्मा का मिलन, ज्ञानीगण कहते हैं ‘ब्रह्माविद ब्रह्मैब भवति’।
यद्यपि हमारे बात हो रही थी भक्ति मार्ग को लेकर । यही मार्ग पकड़े रखा है बाउल वैष्णव जन । राधाकृष्ण का कीर्तन जहां भी आयोजित क्यो न हो_ वहां पर देखा जाता है अंत में राधाकृष्ण का मिलन होकर (हरि नाम) कीर्तन समापन होता है । भक्त और भगवान का मिलन हीं राधाकृष्ण का मिलन या _भक्तिमार्ग का एकमात्र लक्ष्य है, अंतिम गंतव्य है ! इसी तरह जहां से प्रारंभ हुआ था जीवन यात्रा ( ब्रह्मा) वहां पर ही आकर समाप्त होता है जीवन नौटंकी का यवनिका (ब्रह्मा) !
” पूर्णमदः पूर्णमीदं पूर्णांत पूर्णमुद्च्ते
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णामेववशिष्यते “।।
। समाप्त ।
( कहानी स्वामी परमानंद जी । संकलक श्रीधर बनर्जी, कथा प्रसंग । Translated by Sudhir Sharma, a former student of Bangaram Paramananda Mission.)