हम इस कहानी का उस समय की बात कर रहे हैं जब गुरु महाराज पगली को मोची से बार-बार यह कहते हुए सुना – ” साधु मरण से होशियार ” इसके रहस्य जानने के लिए गुरु महाराज जी ने वह पगली का पीछा करना शुरू किया था। अब आगे-
क्योंकि वह पगली के साथ गुरु महाराज जी का पहले से ही बहुत प्यारा रिस्ता था। वह पगली ने ही एक दिन (बालक ) गुरु महाराज जी को अत्यंत भूख से बचाई थी । कुछ दिन पहले ही जब गुरु महाराज बहुत भूखे किसी पेड़ के नीचे बैठे थें,तब वह पगली अचानक वहां आती है और अपने गंदी मैली कपड़ों की झोली में से गरम – गरम और बहुत स्वादिष्ट पकवान खिलाइ थी। तभी से गुरु महाराज भी उन्हें मात्री रूप में भक्ति किया करते थें ! ( दरासल वह पगली माँ थी काशी का साक्षात अन्नपूर्णा! ) जिन्होंने स्थूल शरीर धारण किए हुए रहा करती है । गुरु महाराज कहें थें _ काशी का विशेष बात यही है ! वहां पर विश्वनाथ शिव और मां अन्नपूर्णा कोई ना कोई स्थूल शरीर धारण कर घुमा-फिरा करते हैं । उस दिन गुरु महाराज ने वह पगली को नुसरण किएं और एक सुनसान स्थान पर जाकर मां को पकड़ लिए और उनसे वह मोची लड़के को ऐसा कहने का रहस्य क्या है – वह जानना चाहें । मां अन्नपूर्णा ने सारे बात बिस्तार से बताई _यही कि वह लड़का पूर्व जन्म में पास का आश्रम का महंत ( मंडलेश्वर ) था । यह सब सुनने के उपरांत करुणा निधान होकर गुरु महाराज मां – से प्रार्थना कर बोलें ” माँ ! लड़के को अब मुक्त कर दो ! उसका कर्म फल समाप्त कर दो ! माँ बोली ” तुम कह रहे हो , तो फिर वही होगा ” ।
इसके बाद वहां से उठ कर पगली – माँ सीधा दशाश्वमेध घाट पर जाकर वह मोची लड़के के पास गई – गुरुजी भी उनके पीछे-पीछे चल रहे थें और सब देख रहे थें । माँ लड़के को उद्देश करके फिर से बोली – ” ऐ साधु! बोला था ना मरण से होशियार रहना – मेरी बात माना नहीं – भुगतना तो पड़ेगा ही!” यह कह कर वह हंसने लगी ! वह लड़का कुछ समझ नहीं पाया और अन्य दिनों की भांति लाठी लेकर उन्हें भगाने के लिए तैयार हुआ _ और तभी मां एक विशेष मुद्रा ( रूप ) में खड़ी हो गई! और उसके साथ ही साथ वह लड़के को अपने पूर्व जन्म का सारे स्मृतियां याद आ गई ! लड़का फिर अपनी दुकान और जूते के तरफ देखा तक नहीं और सीधा जाकर गंगा में उतर गया। वहाँ कुछ डुबकियां लगा कर गंगा किनारे कहां से कहां खो गया – फिर उसे फिर कभी किसी ने देखा तक नहीं ! गुरु महाराज ने कहें – – – उसने पिछले जन्म में जिस परंपरा का सन्यासी था वहां ही जाकर दीक्षा लेकर सन्यासी हो गया था और साध- भजन कर बाकी जीवन को बिता दिया !
कहानी समाप्त कर गुरु महाराज उपस्थित सभी को उद्देश्य कर बोलें – – मरण के समय जिस भावना के साथ मनुष्य का मृत्यु होती है , अगले शरीर में वहीं प्रकट होती है । भावना (विचार) – इच्छा – क्रिया; भावना इच्छा का रूप लेने से कार्य के रूप लेता है । यही कर्म जगत का रहस्य है ! इस लिए इच्छाओं आकांक्षा या वासना को अग्नि संयोग करने की बात कहां गया है! वासना को जलाकर भस्म कर देने पर और क्रिया रूप नहीं ले सकता । विचार में अच्छे बुरे जो कुछ भी उदय होने पर भी दोष नहीं लगता । इसलिए ठाकुर श्री रामकृष्ण देव कहें थें ” कलयुग में मन का पाप – पाप नहीं है ” मृत्यु कालीन (शरीर त्यागने का मुहूर्त ) ईष्टचिंता , गुरुचिंता या ईश्वरचिंता में विभोर होकर शरीर त्याग होन से उसका परम गति लाभ होता है। गुरु या ईष्ट का चिन्ता करते-करते मृत्यु होंने से गुरु या ईष्ट उनका भार ग्रहण करते हैं- इसलिए परम गति कहा गया है ।
स्थूल शरीर छोड़ने के उपरांत सूक्ष्म अवस्था में ही गुरु उससे नाना प्रकार का साधनाएँ करवा लेते हैं । उस अवस्था में स्थूल इन्द्रियां सभी न होने से साधना में विशेष सुविधा होती है । फलस्वरूप जब वह शरीर पुनः जन्म लेता है अर्थात वह जब फिर से स्थूल शरीर प्रापत करता है तब उसका ढेरों अग्रगति हो जाती है ! वह शरीर में कामनाएँ वासनाएँ और स्पर्स नहीं करता है । इसलिए गुरु को करुणाकर कहा गया है ! वह जिसाका भार खुद लेतें हैं उसका और चिंता क्या ! वह सही समय पर उससे सही काम करवा लेतें हैं और भवरोग शोक दुःख से मुक्ति कर देते हैं !” वह भवरोग का वैद्य है – मनुष्य का मंगल करने के लिए हीं उनका आगमन होता है ।
मरण के समय शुद्ध भावना रहे, गुरु भावना – ईष्टचिंतन रहे_ इसलिए ही तो साधन-भजन सद्ग्रंथ पाठ, सद्-आलोचना सतसंग – साधुसंग !! मनुष्य जीवन भर जो करता है – मृत्यु के समय उसका ही सृम्भन करता है । इसीलिए गुरु शिक्षा देते हैं _ सदाचार, सत्य विचार से जीवन बिताने से मृत्यु के समय सच्चे मनुष्य का सत्यलोक मे सद् गति होता है , और असत्य चिंता और गलत तरीके से जीवन बिताने से मृत्यु के बाद असद्लोक की गति होती है ! इसीलिए तो ऋषि गन प्रार्थना किया था ” असतो मा सद्गमयम तमसो मा ज्योतिर्गमय। अर्थात अब समझे तो, ‘ माँ ‘ क्यों कहती थी _ ” साधु मरण से होशियार रहना ”
समाप्त
( कहानी स्वामी परमानंद जी । संकलक श्रीधर बनर्जी कथा प्रसंग ll Translated by Sudhir Sharma, a former student of Bangaram Paramananda Mission.)