( भाग- २)

गोरखनाथ सिद्धियां प्राप्त करने के पश्चात अपने गुरु के पास पहुंचा और अपने गुरु मत्छेन्द्रनाथ को साथ चलने के लिए कहा। संसार का मोह छोड़कर गुरुदेव मत्छेन्द्रनाथ चलने से इन्कार किएं । फलस्वरूप गोरखनाथ को कुछ चमत्कारी शक्तियों का प्रयोग करना पड़ा! उसने गुरुदेव का छोटे बेटे को पटक कर मार डाला और पुनः उसे जीवित कर दिया ! यह देखकर उनके पत्नी बोली – अब आगे………

मीणनाथ की पत्नी जल्दी से बोली, “सुनिए ! यह बहुत ही खतरनाक इंसान है ! आप उसके साथ चले जाओ जी ! नहीं तो ए फिर से मेरे बाल बच्चोंको मार डालेगा ! इसके अलावा और भी क्या कुछ विनाश करेगा यह कौन जाने ?” मीणनाथ भी सोचें उनके शिष्य में एक जबरदस्त शक्ति आई है – जो आम मनुष्यों के सोच से परे हैं ! अर्थात उसे अपने शिष्य के साथ चले जाना ही बेहतर होगा, अन्यथा सच में ही कोई अनहोनी हो सकता है ! तब उन्होंने गोरखनाथ से थोड़ी देर रुकने के लिए कहें, और तैयार होकर अपने पत्नी को कुछ जरूरी बातें कह कर गोरखनाथ के साथ निकल पड़े ।

रास्ते में चलते-चलते गोरखनाथ ने देखा गुरुदेव ने जो झोला अपने साथ रख्खा है वह कभी भी अपने से अलग नहीं कर रहें हैं। एक दिन एक झरने के किनारे एक पत्थर के ऊपर अपनी झोला उतार कर मीणनाथ स्नान करने के लिए पानी में उतरें – तभी गोरखनाथ ने वह झोले के अंदर झांका, देखा उसमे एक सोने की गांठ है । गोरखनाथ के हाथ में वह गांठ देखते ही गुरुदेव ने पानी से दौड़ते भागते हुए आए । आकर बहुत ही उतावला होकर कहें , ” दो, दो ! यह मेरे हाथ में दो ! मेरे जीवन में जमाए धन का एक बड़ा हिस्सा, मै अपने साथ लेकर आया हूं भविष्य के लिए ! कहां किस प्रकार रहना होगा , जिसका कोई ठिकाना नहीं_ इसलिए इससे प्राप्त हुई पैसा हमें काम आएगा, यही सोचकर इसे लाया हूं ।”

गोरखनाथ ने देखा गुरुदेव के मन से अभी भी विषय का मोह गई नही, अर्थ का लालच अभी भी है, इसलिए उसने वह सोने का गठरी को झरने के धारा में फेंक दिया। मीणनाथ हे-हे करके पानी में खुद पड़ें और वह सोने की थैली खोजने लगें !

गोरखनाथ ने गुरुदेव को पकड़कर पानी से ऊपर लाया। गुरुदेव से कहा – ” ऐसा क्या अनहोनी हो गया जो आप इतने उतावले हो रहें हैं? ” मीणनाथ कहें , उतावला नहीं होऊंगा ? उसे जमाने में मुझे कितना परिश्रम करना पड़ा, इसके अलावा वह (सोना) भविष्य में हमें कितने काम आता – यह तुम्हें पता है ? गुरुदेव का उतावलापन देखकर गोरखनाथ अपने हाथ में लिए चिमटे – को एक बड़े पत्थर के ऊपर तीन बार पटकते हुए कहा, ” गुरुदेव मीणनाथ का कृपा यदि मेरे ऊपर हो, तो गुरुदेव की कृपा से यह चट्टान सोने का बन जाए। ” बात खत्म होते ना होतेही वह विशाल पत्थर सोने में के पत्थर में तबदिल हो गया । यह देखकर मीणनाथ की आंखे फटी कि फटी रह गई !

गोरखनाथ ने कहा- ” प्रभु ! देखें तो, मेरे ऊपर आपकी कितनी कृपा है ! आपकी कृपा से आपका नाम लेते हैं कितने अनहोनी हो रही है! जागतिक जिस विषय समूह के लिए आपको इतनी व्याकुलता हो रही हैं, वह सब कुछ तो आपकी कृपा से आपके चरणों में आकर हाजिर हो रही है – तो फिर यह सब के लिए समय बर्बाद करके क्या फायदा ! आप आब से परमार्थक विषयों को पाने के लिए प्रयास करें ।”

यहां गोरखनाथ खुद शिष्य होते हुए भी गुरु का भूमिका निभाया अर्थात गुरुदेव मीणनाथ को सन्यास धर्म छोड़कर गृहस्थ होने के दौरान जो भी निम्न गती हुई थी, गोरखनाथ ने गुरु मीणनाथ को फिर से नए सिरे से उनके खोई हुई राह पर लौटा दिया! स्नान आदि से मीणनाथ बाहरी शुद्ध हुए , सिर्फ बाकी रहा आंतरिक शुद्धि का काम ! अर्थात साधना का मार्ग ! इस बार शिष्य हीं गुरु को साधना की नई दिशा दिखाई और धीरे-धीरे कुछ ही सालों में मीणनाथ या मत्छेन्द्रनाथ भी योग सिद्ध हो गए।

गुरु महाराज जी बोलें – ” कहावत में है – गुरु मिले लाखों लाखों तो चेला मिले एक ” – यह हुए इसी प्रकार का शिष्या ! जो खुद से उद्धार होकर गुरु को भी खींच लाया आध्यात्मिकता की चरम शिखर पर । आगे चलकर वह गोरखनाथ को शिव अवतार के रूप में माना गया। आदिनाथ या शिव से ही ‘नाथ ‘ परंपरा या ‘नाथ योगी ‘ परंपरा का प्रारंभ हुई । गोरखनाथ महावीर या भगवान बुद्ध के भी आगे का व्यक्ति (महात्मा) है! कुछ को मानना है कि महावीर भी ‘नाथ’ परंपरा का योगी थे। क्योंकि महावीर परंपरा के आदि गुरु आदिनाथ, महावीर के दुसरे गुरु थें पार्श्वनाथ । पार्श्वनाथ ही अपभ्रंश होकर परशनाथ हुए । कोई कोई शोधकर्ताओं को यह मानना है कि गौतम बुद्ध या अमिताभ बुद्ध भी पृथक कोई परंपरा से नहीं, उन्होंने नाथ परंपरा का ही साधन मार्ग को अवलंबन करके ज्ञान ( सिद्धियां) प्राप्त किया।

। समाप्त।
कहानी स्वामी परमानंद जी। संकलक श्रीधर बनर्जी ‘कथा प्रसंग’ । Translated by Sudhir Sharma, a former student of Bangaram Paramananda Mission.